झारखंड आदिवासी महोत्सव में गूंजा संस्कृति, परंपरा और विरासत का संदेश
दुमका/निज संवाददाता। कन्वेंशन सेंटर, दुमका में झारखंड आदिवासी महोत्सव 2026 का उद्घाटन मुख्य अतिथि दुमका सांसद नलिन सोरेन सहित उपस्थित अतिथियों ने दीप प्रज्वलित कर किया। कार्यक्रम में आदिवासी समाज की समृद्ध भाषा, साहित्य, कला, संस्कृति, परंपरा एवं विरासत के संरक्षण और संवर्धन पर विशेष जोर दिया गया। महोत्सव के माध्यम से आदिवासी संस्कृति की विविधता और समृद्ध विरासत को आम लोगों तक पहुंचाने के साथ नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने का संदेश दिया गया। कार्यक्रम को संबोधित करते हुए सांसद नलिन सोरेन ने कहा कि आदिवासी समाज की पहचान उसकी भाषा, संस्कृति, परंपरा और जीवनशैली से है। अपनी मातृभाषा, लोक परंपराओं और रीति-रिवाजों को समझना तथा आने वाली पीढ़ी को इससे जोड़कर रखना जरूरी है। उन्होंने कहा कि अपनी पहचान को लेकर किसी प्रकार की हीन भावना नहीं होनी चाहिए, बल्कि गर्व के साथ कहना चाहिए कि हम आदिवासी हैं।
जल, जंगल और जमीन की रक्षा सबकी जिम्मेदारी
दुमका। सांसद ने कहा कि आदिवासी संस्कृति केवल परंपराओं तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें प्रकृति के साथ सामंजस्य, सामुदायिक जीवन, आपसी सहयोग और सामाजिक समरसता की भावना भी निहित है। आदिवासी समाज सदियों से प्रकृति के साथ जुड़कर जीवन जीता आया है और जल, जंगल एवं जमीन उसके जीवन और संस्कृति का अभिन्न हिस्सा हैं। इनके संरक्षण की जिम्मेदारी किसी एक व्यक्ति या समुदाय की नहीं, बल्कि सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि आधुनिकता और विकास के साथ कदम से कदम मिलाकर आगे बढ़ना जरूरी है, लेकिन विकास की दौड़ में अपनी जड़ों, परंपराओं और सांस्कृतिक मूल्यों को नहीं भूलना चाहिए। नई पीढ़ी को आधुनिक शिक्षा एवं तकनीक के साथ अपनी भाषा और संस्कृति की जानकारी भी होनी चाहिए। उन्होंने झारखंड आदिवासी महोत्सव को संस्कृति और विरासत को जानने-समझने का महत्वपूर्ण अवसर बताते हुए युवाओं से अपनी भाषा एवं संस्कृति सीखने और उसे आगे बढ़ाने का आ”ान किया।
सिदो-कान्हू और फूलो-झानो के संघर्ष से लें प्रेरणा: उपायुक्त
दुमका। उपायुक्त अभिजीत सिन्हा ने विश्व आदिवासी दिवस एवं झारखंड आदिवासी महोत्सव के अवसर पर जिलेवासियों को शुभकामनाएं देते हुए कहा कि यह दिन आदिवासी समाज की समृद्ध संस्कृति, परंपरा, भाषा, कला, जीवनशैली और गौरवशाली विरासत को याद करने तथा आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने का अवसर है। उन्होंने कहा कि संताल परगना की धरती वीरों, संघर्ष और समृद्ध सांस्कृतिक परंपराओं की धरती रही है। सिदो-कान्हू, चांद-भैरव, फूलो-झानो और भगवान बिरसा मुंडा जैसे महान नायकों ने अपने साहस, संघर्ष और बलिदान से समाज को नई दिशा दी। उनके आदर्श आज भी प्रेरणा देते हैं। उपायुक्त ने कहा कि आदिवासी समाज के लोग शिक्षा सहित विभिन्न क्षेत्रों में आगे बढ़ रहे हैं। सरकार और जिला प्रशासन आदिवासी समुदाय के सर्वांगीण विकास के लिए लगातार कार्य कर रहे हैं। आदिम जनजाति एवं आदिवासी विद्यार्थियों के लिए विशेष आवासीय विद्यालय, छात्रावास और एकलव्य मॉडल विद्यालय जैसी सुविधाओं का विकास किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि विकास तभी सार्थक होगा, जब उसकी पहुंच समाज के अंतिम व्यक्ति तक हो। सुदूर क्षेत्रों में सड़क, बिजली, पेयजल, स्वास्थ्य, शिक्षा और एंबुलेंस जैसी मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए प्रशासन प्रयासरत है।
कला और प्रतिभाओं को मिला मंच, कलाकार हुए सम्मानित
दुमका। उपायुक्त ने कहा कि झारखंड आदिवासी महोत्सव जैसे आयोजन केवल सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि पहचान, विरासत और प्रतिभाओं को सामने लाने का महत्वपूर्ण माध्यम हैं। दुमका और संताल परगना में कला, साहित्य, लोक संगीत, चित्रकला, कृषि सहित विभिन्न क्षेत्रों में अनेक प्रतिभाएं मौजूद हैं। महोत्सव में कस्तूरबा गांधी आवासीय बालिका विद्यालयों की छात्राओं एवं स्थानीय कलाकारों ने पारंपरिक गीत, संगीत और नृत्य की आकर्षक प्रस्तुतियां दीं। ट्राइबल फैशन शो, हूल वीर बाजल सोरेन पर आधारित लघु नाटक तथा थॉमस टुडू एंड ग्रुप बैंड की प्रस्तुति ने कार्यक्रम में समां बांध दिया। विभिन्न क्षेत्रों में उत्कृष्ट योगदान के लिए चुड़ा सोरेन, निर्मला मुर्मू, बोड़ा मुर्मू, एरमेस मुर्मू, बबिता मुर्मू, रिंकी मरांडी, फुटबॉल खिलाड़ी रंजिता हेम्ब्रम और स्ट्रॉबेरी एवं सब्जी की खेती में उल्लेखनीय कार्य करने वाली किरण मुर्मू को सम्मानित किया गया।
विधायक और जिप अध्यक्ष ने भी संस्कृति संरक्षण पर दिया जोर
दुमका। जरमुंडी विधायक देवेंद्र कुंवर ने विश्व आदिवासी दिवस की शुभकामनाएं देते हुए कहा कि आदिवासी समाज की पहचान उसकी समृद्ध संस्कृति, परंपरा, भाषा और प्रकृति से जुड़ी जीवनशैली में निहित है। अपनी माटी, संस्कृति और परंपराओं को संरक्षित रखते हुए आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना सभी की जिम्मेदारी है। जिला परिषद अध्यक्ष जॉयस बेसरा ने कहा कि आदिवासी संस्कृति आने वाली पीढ़ियों के लिए पहचान और गौरव का आधार है। उन्होंने कहा कि शिक्षा, रोजगार, खेल, कला और प्रशासन सहित विभिन्न क्षेत्रों में आदिवासी समाज आगे बढ़ रहा है। समाज की प्रतिभाओं को उचित अवसर और प्रोत्साहन देकर विकास की मुख्यधारा में और मजबूती से आगे बढ़ाया जा सकता है। कार्यक्रम के दौरान राज्य सरकार की विभिन्न जनकल्याणकारी एवं आजीविका उन्मुख योजनाओं के तहत लाभुकों के बीच परिसंपत्तियों का वितरण भी किया गया। इस अवसर पर विभिन्न जनप्रतिनिधि, अधिकारी, विद्यार्थी, कलाकार और बड़ी संख्या में प्रतिभागी उपस्थित थे।
आदिवासी गौरव का क्षण
प्रधानमंत्री ने ‘मन की बात’ में धार्मेंजय के गीत का किया जिक्र
कवि, साहित्याकार, अनुवादक, गीतकार और गायक हैं धार्मेंजय हेम्ब्रम
रानीश्वर/निज संवाददाता। जामताड़ा जिले के बिंदापाथर थाना क्षेत्र के हिदलजोड़ी गांव की मिट्टी से निकले धार्मेंजय हेम्ब्रम आज संथाली साहित्य की नई पीढ़ी के सशक्त हस्ताक्षर के रूप में पहचान बना रहे हैं। संताल हूल पर आधारित उनके गीत ‘जांगा रे पायगान’ को राष्ट्रीय पहचान तब मिली, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने कार्यक्रम ‘मन की बात’ में इसका उल्लेख किया। धार्मेंजय के लिए यह उपलब्धि व्यक्तिगत सम्मान से कहीं आगे बढ़कर संथाली भाषा और आदिवासी सांस्कृतिक विरासत को राष्ट्रीय मंच पर पहचान दिलाने वाला महत्वपूर्ण पड़ाव बनी। धार्मेंजय कवि के साथ गीतकार और गायक भी हैं। आदिवासी सेंगेल अभियान के जोनल हेड मार्नाड हांसदा के अनुसार किसान परिवार में पले-बढ़े धार्मेंजय ने सीमित संसाधनों के बीच साहित्य को अपनी साधना बनाया। उनकी रचनाओं में संथाली समाज का जीवन, प्रकृति, प्रेम, संघर्ष, भाषा-संस्कृति और अस्मिता के विविध रंग दिखाई देते हैं। गांव का सहज जीवन, खेतों की हरियाली, लोकगीतों की लय और आदिवासी परंपराएं उनके व्यक्तित्व की पहली पाठशाला रहीं। किसान परिवार में जन्म लेने के कारण उन्होंने श्रम और संघर्ष को करीब से देखा। आर्थिक सीमाओं के बावजूद मातृभाषा और संस्कृति के प्रति उनका जुड़ाव लगातार मजबूत होता गया। उन्होंने लेखन को केवल अभिव्यक्ति का माध्यम न मानकर समाज एवं सांस्कृतिक चेतना को मजबूत करने का जरिया बनाया। उनका चर्चित संथाली कविता संग्रह ‘दुलाइ रेयाक् मेत्’ संथाली समाज की संवेदनाओं, स्मृतियों, प्रकृति और बदलते सामाजिक यथार्थ को सामने लाता है। उनकी कविताओं में प्रेम और प्रकृति के साथ अपनी जड़ों तथा सांस्कृतिक पहचान से जुड़े रहने की गहरी भावना भी दिखाई देती है। विश्व आदिवासी दिवस समारोह में झारखंड विधानसभा अध्यक्ष रवींद्रनाथ महतो ने धार्मेंजय के साहित्यिक योगदान की सराहना की।
महत्वपूर्ण पुस्तकों का संथाली में किया है अनुवाद
रानीश्वर। धार्मेंजय का योगदान मौलिक लेखन तक सीमित नहीं है। उन्होंने हिंदी की महत्वपूर्ण पुस्तकों का संथाली में अनुवाद कर दोनों भाषाओं के बीच साहित्यिक संवाद को मजबूत किया है। ‘लाड़हाई आर सांघार’, ‘संताली सांवहेत् रेन नामडाक सांवहेंदिया बाबूलाल मुर्मू आदिवासी’ और साहित्य अकादमी की चर्चित पुस्तक ‘लुलु का आविष्कार’ के संथाली अनुवाद को उनकी प्रमुख उपलब्धियों में शामिल किया जाता है। धार्मेंजय का मानना है कि भाषा किसी समाज की आत्मा और उसकी पहचान की सबसे मजबूत कड़ी है। इसी सोच के साथ वे नई पीढ़ी को संथाली में पढ़ने-लिखने और सृजन के लिए प्रेरित कर रहे हैं। प्रभात खबर, देवघर की ओर से उन्हें संताल यूथ आइकॉन-2025 से भी सम्मानित किया जा चुका है। वर्तमान में वे भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर के भारतीय भाषाविज्ञान डेटा संकाय में कनिष्ठ संसाधन व्यक्ति-द्वितीय के रूप में संथाली भाषा के संरक्षण, प्रलेखन और विकास से जुड़े कार्य कर रहे हैं।